मिट्टी को बारिश से इश्क़ था
मिट्टी को बारिश से इश्क़ था,
शायद तभी तो
पहली बूंद के गिरते ही
वह अपनी सारी ख़ुशबू
हवा के हवाले कर देती थी।
न कोई शिकायत,
न कोई सवाल
बस एक लंबा-सा इंतज़ार
और फिर
आसमान से उतरती
कुछ बूंदें।
बारिश आती,
मिट्टी को छूती,
उसकी ख़ामोशी को सुनती
और फिर चली जाती।
मिट्टी जानती थी
कि बारिश हमेशा नहीं ठहरेगी,
फिर भी
हर बार उसके आने पर
वह वैसे ही खिल उठती थी।
मैं खिड़की के पास बैठा
देर तक यह सब देखता रहा।
सोचता रहl
आख़िर ऐसा क्या है
इस बारिश में
कि सूखी मिट्टी भी
इसके स्पर्श से
महक उठती है?
शायद कुछ रिश्ते भी
ऐसे ही होते हैं।
कोई आता है,
तुम्हें छूकर गुज़र जाता है,
तुम्हारे भीतर की
किसी सोई हुई चीज़ को जगा जाता है,
और फिर
अपने रास्ते चला जाता है।
लेकिन उसके जाने के बाद भी
तुम पहले जैसे नहीं रहते।
बाहर बारिश तेज़ हो चुकी थी।
हवा के साथ कुछ बूंदें
खिड़की से भीतर आ रही थीं।
मेरी मेज़ पर रखी
एक पुरानी डायरी
उन बूंदों की पहुँच में थी।
मैंने उसे हटाना चाहा,
फिर जाने क्यों
हाथ रोक लिया।
एक बूंद
एक पन्ने पर गिरी।
फिर दूसरी।
स्याही थोड़ी फैल गई।
मैंने डायरी खोली।
वो वही पन्ने थे
जिन्हें मैंने बरसों पहले
कुछ कहने के लिए लिखा था,
मगर कभी किसी को
कह नहीं पाया।
कुछ अधूरे ख़त,
कुछ अधूरी कविताएँ,
कुछ ऐसे सवाल
जिनके जवाब
मैंने वक़्त से माँगे थे।
एक पन्ने पर
एक सपना लिखा था।
दूसरे पर
किसी के लिए बचाकर रखे
कुछ शब्द।
तीसरे पर
एक ऐसा डर
जिसे मैंने हमेशा
अपने भीतर छिपाकर रखा।
बारिश की बूंदें
उन पन्नों पर गिरती रहीं।
स्याही बहती रही।
कुछ शब्द मिट गए।
कुछ आधे रह गए।
और कुछ
इतने धुंधले हो गए
कि उन्हें पढ़ना मुश्किल था।
अजीब बात थी
मुझे दुख नहीं हुआ।
शायद इसलिए
क्योंकि पहली बार समझ आया
कि हर शब्द का
बचा रहना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ शब्द
बस लिखे जाने के लिए होते हैं।
कुछ यादें
बस याद रह जाने के लिए।
और कुछ ख़त
कभी भेजे ही नहीं जाते
क्योंकि उनका मक़सद
किसी और तक पहुँचना नहीं,
बल्कि अपने भीतर का बोझ
काग़ज़ तक पहुँचा देना होता है।
मैंने उन भीगे पन्नों को देखा।
जो लिखा था,
वह अब वैसा नहीं था।
लेकिन शायद
मैं भी तो वैसा नहीं था।
वक़्त ने बहुत कुछ बदला था।
कुछ लोग आए,
कुछ चले गए।
कुछ सपने पूरे हुए,
कुछ रास्ते बदल गए।
कुछ सवालों के जवाब मिले,
और कुछ सवाल
सवाल ही रह गए।
फिर मेरी नज़र
खिड़की के बाहर गई।
बारिश अब धीमी हो रही थी।
मिट्टी फिर भीगी हुई थी।
उससे वही ख़ुशबू उठ रही थी
जैसे वह कह रही हो,
“देखो,
बारिश चली भी जाए
तो उसका असर
इतनी जल्दी नहीं जाता।”
तभी मुझे लगा,
शायद मिट्टी को बारिश से
इश्क़ इसलिए नहीं था
कि बारिश उसके पास रुकती थी।
उसे इश्क़ इसलिए था
क्योंकि बारिश
उसके भीतर कुछ जगा देती थी।
बीजों को।
ख़ुशबू को।
एक नई शुरुआत को।
और शायद
इश्क़ भी यही है।
किसी को
हमेशा अपने पास रखना नहीं।
किसी के लौटने की
उम्मीद में उम्र गुज़ारना नहीं।
इश्क़ शायद वह है
जब किसी की मौजूदगी
तुम्हारे भीतर
कुछ अच्छा जगा दे।
जब कोई तुम्हें
तुमसे ही मिला दे।
जब कोई चला जाए
फिर भी
उसके आने के बाद
तुम्हारे भीतर
एक नई दुनिया उग आए।
उस शाम
बारिश ने मेरे कुछ पन्ने भिगो दिए थे।
कुछ शब्द मिटा दिए थे।
लेकिन उसी बारिश ने
मुझे एक नई कविता दे दी।
एक ऐसी कविता
जो किसी काग़ज़ पर नहीं,
मेरे भीतर लिखी गई थी।
मैंने आख़िरी बार
भीगी मिट्टी को देखा
और मुस्कुरा दिया।
अब समझ आया था
मिट्टी को बारिश से इश्क़ था,
पन्ने बारिश में भीग गए थे,
और मैं…
मैंने बारिश से
इश्क़ का मतलब सीखा था।
कि हर मिलना
हमेशा के लिए नहीं होता।
कि हर बिछड़ना
अंत नहीं होता।
कि कुछ लोग
बारिश की तरह आते हैं
थोड़ी देर ठहरते हैं,
तुम्हें छूते हैं,
तुम्हारे भीतर कुछ उगाते हैं
और फिर चले जाते हैं।
और शायद
उनका जाना भी
उनके आने जितना ही ज़रूरी होता है।
क्योंकि अगर बारिश
हमेशा ठहर जाए,
तो मिट्टी
बारिश को याद करना
कहाँ सीखेगी?
मैंने डायरी बंद की।
भीगे हुए पन्नों को
सूखने के लिए छोड़ दिया।
कुछ शब्द शायद
फिर कभी पढ़े जा सकेंगे।
कुछ शायद नहीं।
लेकिन अब मुझे
उनके मिट जाने का डर नहीं था।
क्योंकि मैंने जान लिया था
कुछ इश्क़
पन्नों पर नहीं टिकते,
वे बारिश की तरह
आते हैं,
मिट्टी की तरह
महकते हैं,
और फिर
ज़िंदगी में कहीं
चुपचाप उग आते हैं।